आज से लगभग 600 वर्ष पूर्व श्री जगन्नाथजी की पावन भूमि, ओडिशा में भगवान श्रीहरि के नित्य पंचसखाओं (पांच परम मित्रों व भक्तों) ने एक बार पुनः जन्म लिया। उन्होंने ताड़ के पत्तों पर लिखी अपनी ग्रंथावलियों में भविष्य में होने वाली घटनाओं की विस्तृत भविष्यवाणियां कीं, जो उनकी समाधि के बाद से ही एक-एक कर सत्य सिद्ध हो रही हैं। उनकी वह ग्रंथमाला 'भविष्य मालिका' के नाम से जानी जाती है, जिसका प्रचार-प्रसार आज विभिन्न भाषाओं में हो रहा है।
'पंचसखा' सभी चार युगों में जन्म लेते और हरिभक्ति का प्रचार-प्रसार करते आये हैं। हर युग में इनके नाम इस प्रकार थे:
"सतयुग"
- नारद
- मार्कण्डेय
- गर्ग
- स्वयंभू
- कृपाचार्य
"त्रेतायुग"
- नल
- नील
- जाम्बवंत
- सुसेन
- हनुमंत
"द्वापरयुग"
- दाम
- सुदाम
- सुबल
- सुबाहु
- सुभक्ष
"कलियुग"
- अच्युतानंद दास
- शिशु अनन्त दास
- यशवंत दास
- बलराम दास
- जगन्नाथ दास
"जय जगन्नाथ"

