श्री मद्भागवत महापुराण का संक्षिप्त वर्णन

नारद जी की प्रेरणा से वेद व्यास जी  ने श्रीमद् भागवत (Shrimad Bhagwat) ग्रन्थ लिखा है। श्रीमद् भागवत में 335 अध्याय हैं। यह व्यास जी द्वारा 18 पुराणों में से रचित बहुत श्रेष्ठ पुराण है। श्रीमद् भागवत कथा में 18 हजार श्लोक, 335 अध्याय व 12 स्कंध हैं।

अन्य पुराणों के समान, श्रीमद् भागवत ऋषि वेद व्यास द्वारा लिखे गए हैं। ऋषि शुकदेव जी, जो वेद व्यास के बेटे थे उन्होंने श्रीमद् भागवत को राजा परीक्षित को सुनाया था। राजा परीक्षित वो जिनको ऋषि श्रुंगी द्वारा 7 दिनों में तक्षक साँप द्वारा मारे जाने के लिए शाप दिया गया था।

इसमें भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया है। विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं का ज्ञान कराती इस पुराण में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गुण-सगुण ज्ञान प्राप्त होता है। श्रीमद् भागवत पुराण विद्या का अक्षय भंडार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला है।

यह भक्तिशाखा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है और आचार्यों ने इसकी अनेक टीकाएँ की है। कृष्ण-भक्ति का यह आगार है। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या 'राधा' का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है।

प्रथम स्कंध

इस पुराण के प्रथम स्कंध में उन्नीस (19) अध्याय हैं जिनमें शुकदेव जी ईश्वर भक्ति का माहात्म्य सुनाते हैं। भगवान के विविध अवतारों का वर्णन, देवर्षि नारद के पूर्वजन्मों का चित्रण, राजा परीक्षित के जन्म, कर्म और मोक्ष की कथा, अश्वत्थामा का निन्दनीय कृत्य और उसकी पराजय, भीष्म पितामह का प्राणत्याग, श्रीकृष्ण का द्वारका गमन, विदुर के उपदेश, धृतराष्ट्र, गान्धारी तथा कुन्ती की तन गमन एवं पाण्डवों का स्वर्गारोहण के लिए हिमालय में जाना आदि घटनाओं का क्रमवार कथानक के रूप में वर्णन किया गया है।

द्वितीय स्कंध

इस स्कंध का प्रारम्भ भगवान के विराट स्वरूप वर्णन से होता है। इसके बाद विभिन्न देवताओं की उपासना, गीता का उपदेश, श्रीकृष्ण की महिमा और 'कृष्णार्पणमस्तु' की भावना से की गई भक्ति का उल्लेख है। इसमें बताया गया है कि सभी जीवात्माओं में 'आत्मा' स्वरूप कृष्ण ही विराजमान हैं। पुराणों के दस लक्षणों और सृष्टि-उत्पत्ति का उल्लेख भी इस स्कंध में मिलता है।

तृतीय स्कंध

तृतीय स्कंध उद्धव और विदुर जी की भेंट के साथ प्रारम्भ होता है। इसमें उद्धव जी श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं तथा अन्य लीला चरित्रों का उल्लेख करते हैं। इसके अलावा विदुर और मैत्रेय ऋषि की भेंट, सृष्टि क्रम का उल्लेख, ब्रह्मा की उत्पत्ति, काल विभाजन का वर्णन, सृष्टि-विस्तार का वर्णन, वराह अवतार की कथा, दितिके आग्रह पर ऋषि कश्यप द्वारा असमय दिति से सहवास एवं दो अमंगलकारी राक्षस पुत्रों के जन्म का शाप देना जय-विजय का सनत्कुमार द्वारा शापित होकर विष्णुलोक से गिरना और दिति के गर्भ से 'हिरण्याक्ष' एवं 'हिरण्यकशिपु' के रूप में जन्म लेना, प्रह्लाद की भक्ति, वराह अवतार द्वारा हिरण्याक्ष और नृसिंह अवतार द्वारा हिरण्यकशिपु का वध, कर्दम-देवहूति का विवाह, सांख्य शास्त्र का उपदेश तथा कपिल मुनि के रूप में भगवान का अवतार आदि का वर्णन इस स्कंध में किया गया है।

चतुर्थ स्कंध

इस स्कंध की प्रसिद्धि 'पुरंजनोपाख्यान' के कारण बहुत अधिक है। इसमें पुरंजन नामक राजा और भारतखण्ड की एक सुन्दरी का रूपक दिया गया है। इस कथा में पुरंजन भोग-विलास की इच्छा से नवद्वार वाली नगरी में प्रवेश करता है। वहाँ वह यवनों और गंधर्वों के आक्रमण से माना जाता है। रूपक यह है कि नवद्वार वाली नगरी यह शरीर है। युवावस्था में जीव इसमें स्वच्छंद रूप से विहार करता है। लेकिन कालकन्या रूपी वृद्धावस्था के आक्रमण से उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है और अन्त में उसमें आग लगा दी जाती है।

रूपक को स्पष्ट करते हुए नारद जी कहते हैं- "पुरंजन देहधारी जीव है और नौ द्वार वाला नगर यह मानव देह है (नौ द्वार- दो आँखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, एक गुदा, एक लिंग)। अविद्या तथा अज्ञान की माया रूपी वह सुन्दरी है। उसके दास सेवक दस इन्द्रियाँ हैं। इस नगर की रक्षा पंचमुखी सर्प करते हैं। ग्यारह सेनापति, पाप और पुण्य के दो पहिए, तीन गुणोंवाली रथ की ध्वजा, त्वचा आदि सात धातुओं का आवरण तथा इन्द्रियों द्वारा भोग शिकार का प्रतीक है। काल की प्रबल गति एवं वेग ही शत्रु गंधर्व चण्डवेग है। उसके तीन सौ साठ गंधर्व सैनिक वर्ष के तीन सौ साठ दिन एवं रात्रि हैं, जो शनै:-शनै: आयु का हरण करते हैं। पाँच प्राण वाला मनुष्य रात-दिन उनसे युद्ध करता रहता है और हारता रहता है। काल भयग्रस्त जीव को ज्वर अथवा व्याधि से नष्ट कर देता है।

इस रूपक का भाव यही है कि मनुष्य अपनी इन्द्रियों के उपभोग से निरन्तर भोग-विलास में पड़कर अपने शरीर का क्षय करता रहता है। वृद्धावस्था आने पर शक्ति क्षीण होकर अनेक रोगों से ग्रस्त एवं नष्ट हो जाता है। परिजन उसके पार्थिव शरीर को आग की भेंट चढ़ा देते हैं।

पंचम स्कंध

पंचम स्कंध में प्रियव्रत, अग्नीध्र, राजा नाभि, ऋषभदेवतथा भरत आदि राजाओं के चरित्रों का वर्णन है। यह भरत जड़ भरत है, शकुन्तला पुत्र नहीं। भरत का मृग मोह में मृग योनि में जन्म, फिर गण्डक नदी के प्रताप से ब्राह्मण कुल में जन्म तथा सिंधु सौवीर नरेश से आध्यात्मिक संवाद आदि का उल्लेख है। इसके पश्चात पुरंजनोपाख्यान की भाँति रूपक द्वारा प्राणियों के संसार रूपी मार्ग का सुन्दर वर्णन किया गया है। इसके बाद भरत वंश तथा भुवन कोश का वर्णन है। तदुपरान्त गंगावतरण की कथा, भारत का भौगोलिक वर्णन तथा भगवान विष्णु का स्मरण शिशुमार नामक ज्योतिष चक्र द्वारा करने की विधि बताई गई है। अंत में विभिन्न प्रकार के रौरव नरकों का वर्णन यहाँ किया गया है।

षष्ठ स्कंध

षष्ठ स्कंध में नारायण कवच और पुंसवन व्रत विधि का वर्णन जनोपयोगी दृष्टि से किया गया है। पुंसवन व्रत करने से पुत्र की प्राप्ति होती है। व्याधियों, रोगों तथा ग्रहों के दुष्प्रभावों से मनुष्य की रक्षा होती है। एकादशी एवंद्वादशी के दिन इसे अवश्य करना चाहिए।

इस स्कंध का प्रारम्भ कान्यकुब्ज के निवासी अजामिल उजामिल उपाख्यान से होता है। अपनी मृत्यु के समयअजामिल अपने पुत्र 'नारायण' को पुकारता है। उसकी पुकार पर भगवान विष्णु के दूत आते हैं और उसे परमलोक ले जाते हैं। भागवत धर्म की महिमा बताते हुए विष्णु-दूत कहते हैं कि चोर, शराबी, मित्र-द्रोही, ब्रह्मघाती, गुरु-पत्नीगामी और चाहे कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, यदि वह भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करता है तो उसके कोटि-कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। किन्तु इस कथन में अतिशयोक्ति दिखाई देती है। परस्त्रीगामी और गुरु की पत्नी के साथ समागम करने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता। यह तो जघन्य पाप है। ऐसा व्यक्ति रौरव नरक में ही गिरता है।

इसी स्कंध में दक्ष प्रजापति के वंश का भी वर्णन प्राप्त होता है। नारायण कवच के प्रयोग से इन्द्र को शत्रु पर भारी विजय प्राप्त होती है। इस कवच का प्रभाव मृत्यु के पश्चात भी रहता है। इसमें वत्रासुर राक्षस द्वारा देवताओं की पराजयस, दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र निर्माण तथा वत्रासुर के वध की कथा भी दी गई है।

सप्तम स्कंध

सप्तम स्कंध में भक्तराज प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा विस्तारपूर्वक है। इसके अतिरिक्त मानव धर्म, वर्ण धर्म और स्त्री धर्म का विस्तृत विवेचन है। भक्त प्रह्लाद के कथानक के माध्यम से धर्म, त्याग, भक्ति तथा निस्पृहता आदि की चर्चा की गई है।

अष्टम स्कंध

इस स्कंध में ग्राह द्वारा गजेन्द्र के पकड़े जाने पर विष्णु द्वारा गजेन्द्र उद्धार की कथा का रोचक वृत्तान्त है। इसी स्कन्ध में समुद्र मन्थन और मोहिनी रूप में विष्णु द्वारा अमृत बांटने की कथा भी है। देवासुर संग्राम और भगवान के 'वामन अवतार' की कथा भी इस स्कंध में है। अन्त में 'मत्स्यावतार' की कथा यह स्कंध समाप्त हो जाता है।

नवम स्कंध

पुराणों के एक लक्षण 'वंशानुचरित' के अनुसार, इस स्कंध में मनु एवं उनके पाँच पुत्रों के वंश-इक्ष्वाकु वंश,निमि वंश, चंद्र वंश, विश्वामित्र वंश तथा पुरू वंश, भरत वंश, मगध वंश, अनु वंश, द्रह्यु वंश, तुर्वसु वंश और यदु वंश आदि का वर्णन प्राप्त होता है। राम, सीता आदि का भी विस्तार से विश्लेषण किया गया है। उनके आदर्शों की व्याख्या भी की गई है।

दशमं स्कंध

यह स्कंध दो खण्डों - 'पूर्वार्द्ध' और 'उत्तरार्द्ध' में विभाजित है। इस स्कंध में श्रीकृष्ण चरित्र विस्तारपूर्वक है। प्रसिद्ध 'रास पंचाध्यायी' भी इसमें प्राप्त होती है। 'पूर्वार्द्ध' के अध्यायों में श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर अक्रूर जी के हस्तिनापुर जाने तक की कथा है। 'नंतरचे' जरासंधाचे युद्ध, द्वारकापुरीचे बांधकाम, रुक्मिणीचे अपहरण, श्रीकृष्णाचे घरगुती जीवन, शिशुपालाचा वध इत्यादींचे वर्णन करते. हा स्कंध श्रीकृष्णाच्या लीलेने पूर्णपणे भरलेला आहे. त्याची सुरुवात वासुदेव देवकीच्या लग्नापासून होते. भविष्यवाणी, कंसाने देवकीच्या मुलांचा वध, कृष्णाचा जन्म, कृष्णाचे बालपण, गाय पाळणे, कंसाचा वध, अक्रूरजीची हस्तिनापूरला भेट, जरासंधाशी युद्ध, द्वारकेतून पलायन, द्वारका नगरीचे बांधकाम, रुक्मिणीशी विवाह, प्रद्युम्नाचा जन्म, शम्भासुराचा वध, कृष्णाचा जामवास्तव, कृष्णाचा वध, जामवास्तव, मनुबाईची कथा. सत्यभामा, उषा-अनिरुद्ध यांचे प्रेमप्रकरण, बाणासुरचे प्रेमप्रकरण. या सोबतच युद्धाच्या घटना आणि राजा नृगाची कथा इ. या भागात कृष्ण आणि सुदामा यांच्या मैत्रीची कथा देखील दिली आहे.

अकरावी विंग

अकराव्या वचनात, राजा जनक आणि नऊ योगी यांच्या संवादातून भगवंताच्या भक्तांची वैशिष्ट्ये सांगितली आहेत. ब्रह्मवेता दत्तात्रेय महाराज यदुला उपदेश करताना म्हणतात की, पृथ्वीपासून संयम, वायूपासून समाधान आणि अलिप्तता, आकाशातून अलिप्तता, पाण्यापासून अलिप्तता, अग्नी आणि मायापासून अलिप्तता, चंद्रापासून अलिप्तता, सूर्यापासून ज्ञान, ग्रहण आणि त्याग शिकायला हवा. पुढे उद्धवाला उपदेश देताना अठरा प्रकारच्या सिद्धींचे वर्णन केले आहे. यानंतर भगवंतांच्या व्यक्तिमत्त्वांचा उल्लेख करताना वर्णाश्रम धर्म, ज्ञानयोग, कर्मयोग आणि भक्तियोग यांचे वर्णन आहे.

बारावी विंग

या विभागात, राजा परीक्षित नंतरच्या राजवंशांचे भविष्यकाळात वर्णन केले आहे. त्याचा सार असा आहे की राजा प्रद्योतन 138 वर्षे राज्य करेल, त्यानंतर शिशुनाग वंशाचे दास राजे, मौर्य वंशाचे दहा राजे 136 वर्षे राज्य करतील, शुंग घराण्याचे दहा राजे 112 वर्षे राज्य करतील, कण्व घराण्याचे चार राजे 34 वर्षे राज्य करतील, त्यानंतर 34 वर्षे राज्य करतील. 456 वर्षे. यानंतर अमीर, गर्दभि, कड, यवन, तुर्क, गुरुंड आणि मौन राजांचे राज्य असेल. मूक राजा 300 वर्षे राज्य करेल आणि उर्वरित राजे एक हजार एकोणण्णव वर्षे राज्य करतील. यानंतर वाल्हिक वंश आणि शूद्र व म्लेच्छांचे राज्य येईल. हे पुराण एक धार्मिक आणि अध्यात्मिक कार्य असण्यासोबतच शुद्ध साहित्यिक आणि ऐतिहासिक कृती म्हणूनही खूप महत्त्वाचे आहे.

जय जगन्नाथ जय श्री माधव