महात्मा पंचसखाओ ने भविष्य मालिका की रचना भगवान निराकार जगन्नाथ जी के निर्देश से की थी। भविष्य मालिका में मुख्य रूप से कलियुग के अंत  के विषय में सामाजिक, भौतिक और भौगोलिक परिवर्तनों के लक्षणों का वर्णन किया गया है। शास्त्रों के लेखन के अतिरिक्त श्रीजगन्नाथ जी के मुख्य क्षेत्र को आदि वैकुण्ठ (मर्त्य वैकुण्ठ) बताया गया है। 5000 वर्ष कलियुग के बीतने के उपरांत पंचसखाओं ने भक्तों के मन से  संशय को दूर करने के लिए बताया कि, भगवान की इच्छानुसार श्री जगन्नाथ जी के नीलांचल क्षेत्र से विभिन्न संकेत प्रकट होंगे और भक्तों को उन संकेतों का अनुकरण करके कलियुग की आयु के अंत और भगवान कल्कि के अवतरण के विषय में ज्ञात हो जाएगा ये सभी तथ्य नीचे दिए गए छंद से हम समझ सकते हैं :-

"दिव्य सिंह अंके बाबू सरब देखिबु,

छाड़ि चका गलु बोली निश्चय जाणिबू

नर बालुत रुपरे आम्भे जनमिबू "

                                                                (गुप्त ज्ञान- अच्युतानंद दास)

 

महात्मा अच्युतानंद जी ने उपरोक्त श्लोक में महाप्रभु श्री जगन्नाथ के प्रथम सेवक और सनातन धर्म के ठाकुर राजा (दिव्य सिंह देव चतुर्थ) के विषय में वर्णन किया हैं। महापुरुष ने इसका भी उल्लेख किया की जगन्नाथ  क्षेत्र में महाराजा इंद्रद्युम्न की परंपरा के अनुसार, अलग-अलग समय में अलग-अलग राजा जगन्नाथ के क्षेत्र के प्रभारी थे। जब चौथे राज्य  दिव्यसिंह देव उपरोक्त वर्णित राजाओं के प्रतिनिधि के रूप में कार्यभार संभालेंगे, तो कलियुग के  5000 वर्ष  बीत चुके होंगे। इससे महापुरुष अच्युतानन्द ने दो बातें सिद्ध की, एक ओर तो चौथे दिव्य सिंह देव राजा के रूप में पदभार संभालेंगे, दूसरी बात यह है कि 5000 वर्ष कलियुग का बीत चुका है और आज कलियुग का 5125वां  वर्ष  चल रहा है।

महात्मा अच्युतानंद ने मालिका में इसकी सत्यता प्रकट की और वर्णन किया कि जब श्रीक्षेत्र के राजा चौथे दिव्य सिंह देव महाराज सत्ता में होंगे (जो वर्तमान में हैं) वही कलियुग के अंत का प्रमाण होगा। पुनः महापुरुष  अच्युतानंद जी ने उपरोक्त पंक्तियों में समझाया कि जब चर्तुथ दिव्य सिंह देव राजा उड़ीसा के श्रीक्षेत्र में शासन करेंगे तो भगवान जगन्नाथ कल्कि अवतार ग्रहण करेंगे और भगवान जगन्नाथ मानव शरीर धारण करके कल्कि अवतार लेंगे तथा धर्म संस्थापना करेंगे।

महापुरूष अच्युतानंद जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि चौथे दिव्य सिंह देव के समय में, कलियुग की आयु पूर्ण हो जायेगी एवं भगवान जगन्नाथ कल्कि के रूप में एक ब्राह्मण के घर में शिशुरुप में जन्म लेंगे । महापुरुष अच्युतानंदजी  ने अपनी अष्ट गुजरी में समझाया:-

 "पूर्व भानु अबा पश्चिमें जिब  अच्युत बचन आन नोहिब ।

पर्वत शिखरे फुटिब कईं  अच्युत बचन मिथ्या नुंहइ।

ठु ल  सुन्यकु मु करिण आस  ठिके भणिले श्री अच्युत दास “

व्याख्या :-

महान माणूस अच्युतानंद जी गडगडाटी आवाजात मलिकेची शुद्धता आणि सत्यता घोषित करतात.  भक्तांच्या मनात भक्ती आणि श्रद्धा जागृत करताना ते म्हणतात की सूर्य पश्चिमेला उगवेल, पर्वत शिखरावर कमळ फुलले तरी त्यांनी लिहिलेले शब्द खोटे ठरणार नाहीत.

"दिव्य केशरी राजा होईब  तेबे कलियुग सारीब

IV दिव्या सिंग थिब  ते काळ्या कलियुगात"

स्पष्टीकरण:-

महापुरुष अच्युतानंद यांनी वरील ओळीत लिहिले आहे की जेव्हा ओरिसाच्या श्रीक्षेत्रात राजा 'दिव्या सिंग देव' IV जर सरकार प्रभारी असते तर कलियुग संपले असते आणि सत्ययुग सुरू झाले असते, पण सत्ययुगाचा प्रभाव कुठेही दिसत नाही. याचे पुन्हा पुन्हा महात्मा अच्युतानंदजींनी आपल्या शब्दांत समर्थन केले आहे. महापुरुष जगन्नाथदासजी माता राधारणीच्या हास्याने अवतरले होते.त्याचा आणखी एक मित्र) यांनीही त्यांच्या भाषणाचे समर्थन केले आहे.

"पुरुषोत्तम देब राजंक थारू,  राजा हेबे सेठारू अनबिन करतो,

अनबिन राजा परे राजा नाही औ,अकुली होईबे कुलकु बोहू".  

वरील ओळींमध्ये महापुरुष श्री जगन्नाथ दासजींनी लिहिले आहे की या जगन्नाथ क्षेत्राचे पहिले राजा श्री पुरुषोत्तम देव असतील. सर्वप्रथम, राजा श्री पुरुषोत्तमदेव यांच्यासह 19 राजे मंदिराच्या कारभाराची जबाबदारी सांभाळतील.

वर्तमान समय में मालिका की बात सत्य हो रही है और 19 वें राजा के रूप में श्री दिव्य सिंह देव चतुर्थ इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं और साथ ही महापुरुष श्रीजगन्नाथदास ने ये भी लिखा है कि 19 वें राजा श्री दिव्य सिंह देव चतुर्थ होंगे और उनका कोई पुत्र नहीं होगा। मालिका की वाणी को सत्य मान कर आज महाप्रभु के भक्त इसको प्रमाणिक मान रहे हैं। 600 वर्ष पूर्व जो उन  महापुरुषों ने  लिखा वह सबकुछ आज निरंतर घटता जा रहा  है । अतः ये सिद्ध होता  कि कलियुग  समाप्त हो गया है और धर्म संस्थापना का समय एवं गुप्त कार्य चल रहा है। महापुरुष अच्युतानंद जी ने भविष्य  मालिका में रचना की  है:-

"चुलरु पथर जेबे ख़सिब सूत , ख़सिले अंला बेढ़ा रु हेब ए कलि हत।"

पुनः श्रीजगन्नाथ के क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए, भविष्यमालिका ग्रंथ में महापुरुष अच्युतानंद दास जी ने भक्तों को सूचित करने के लिए लिखा है  कि जब श्रीजगन्नाथ धाम के मुख्य मंदिर से पत्थर गिरेगा तब समझना कि कलियुग का अंत हो गया है महापुरुष का यह वचन अब सत्य सिद्ध हो गया है । गत दिवस 16.6.1990 को श्री मंदिर के आमला बेढ़ा से एक पत्थर गिरा था जिसकी जांच के लिए केंद्रीय बजट विभाग द्वारा एक समिति गठित की गई, किन्तु वैज्ञानिकों को आजतक पता नहीं चल पाया कि इतना बड़ा पत्थर (1 टन से अधिक) मंदिर में कहाँ से आया और  कैसे गिर गया? ये वैज्ञानिकों के लिए एक आश्चर्यजनक के घटना के साथ शोध का विषय बना हुआ है । सभी महात्माओं और ऋषियों की वाणी सत्य सिद्ध हुई  है, तथा इस रूप में भक्तों के लिए संकेत था। जगन्नाथ मंदिर के भीतर आमला बेढ़ा से पत्थर का गिरना कलियुग के अंत का प्रमाण है।

महापुरुष अच्युतानंद जी ने उनके भविष्य मालिका ग्रंथ गरुड़ संवाद में उल्लेख किया है कि एक दिन भगवान के प्रमुख भक्त विनितानंदन गरुड़ ने महाप्रभु से पूछा कि "भगवन, आपने चारों युग में अवतार लिया है और कलियुग के अंत में आप कल्कि अवतार लेंगे तो चार युगों के भक्तों और भगवान का मिलन होगा। जब आप नीलांचल छोड़ेंगे, दारू ब्रह्म से साकार ब्रह्म बनेंगे, तो भक्तों को नश्वर वैकुंठ से क्या लक्षण दिखाई देंगे, जिससे भक्तों को विश्वास हो कि आपके कल्कि अवतार का समय आ गया है और भक्त मालिका का अनुसरण करें और आपका आशीर्वाद प्राप्त करें?" महापुरुष अच्युतानंद ने भविष्य मालिका में लिखा है:-

 "बड़ देउल  कु आपणे जेबे तेज्या करिबे,

कि कि संकेत देखिले मने प्रत्ये होइबे ।"

उपरोक्त पंक्तियों का अर्थ है कि:-

जब भगवान नीलाचल छोड़ देंगे, तो भक्तों को एक संकेत मिलेगा उसे  देखकर ही विश्वास होगा। तब भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं:-

"गरुड़ मुखकु चाँहिण कहुचंति   अच्युत,

क्षेत्र रे रहिबे अनंत बिमला  लोकनाथ।"

इन पंक्तियों में भगवान ने गरुड़ से कह रहे हैं कि:-

"जब मैं नीलाचल छोडूंगा, तब मेरे ज्येष्ठ भाई बलराम नीलाचल क्षेत्र का दायित्व ग्रहण करेंगे और नीलाचल क्षेत्र के क्षेत्राधीश्वर बनेंगे,‌ शक्तिस्वरूपिणी  मां विमला और लोकनाथ महाप्रभु उस समय उस क्षेत्र में होंगे, लेकिन मैं मानव रूप में जन्म लूंगा।"

फिर गरुड़ ने पूछा कि पहला संकेत क्या होगा कि भक्त मालिका को पढ़ के समझेगा कि आपने  नीलाचल छोड़ दिया है?  पुनः महापुरुष  अच्युतानंद ने बर्णन किया है :-

"देउल रु चुन छाड़िब , चक्र बक्र होइब, माहालिआ होइ भारत अंक कटाउ थिब।"

 

उपरोक्त पंक्तियों का अर्थ ये है :-  

जब श्री जगन्नाथ जी के मुख्य मंदिर में चूने का जो लेप है उस से कुछ कुछ चूना निकल आएगा, तब श्रीजगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा नीलचक्र थोड़ा टेढ़ा हो जाएगा और भारत की आर्थिक स्थिति उस समय अच्छी नहीं होगी।

उपरोक्त पंक्ति से ज्ञात होता है, जब जगन्नाथ मंदिर से चूने का लेप झड़ गया था, उस समय के प्रधान मंत्री डॉ चंद्रशेखर थे और 3000 टन सोना गिरवी रख के भारत में पैसे की कमी को पूरा किया और उसके बाद भारत के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भारत की आर्थिक नीति में बदलाव करके आर्थिक उदारीकरण की नीति को अपनाकर स्थिति में सुधार किया। मालिका की उपरोक्त पंक्ति से सिद्ध होता है कि महापुरूष अच्युतानंद जी ने आज से 600 वर्ष पूर्व जो कहा था कि जब जगन्नाथ मंदिर से चूना निकल जाएगा तब भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होगी और वह आज सिद्ध हो चुकी है। महाप्रभु श्रीकृष्ण दूसरे संकेत के विषय में बताते हैं:-

"बड़  देउल रु पथर जेबे ख़सिब पुण,

गृध्र पक्षी जे बसिब अरुण र स्तम्भेण।"

इन पंक्तियों के भावार्थ यह है कि:-

जब आमला बेढ़ा से पत्थर गिरेगा, तब सूर्य पुत्र अरुण (अरुण स्तंभ ) के ऊपर बाज पक्षी अथबा गिद्ध  बैठ जाएगा। इससे हम ये अनुमान लगा सकते हैं कि जिस समय आमला बेढ़ा  से पत्थर गिरा, उस समय अरुण स्तंभ पर शिकारी गिद्ध पक्षी भी बैठा हुआ था।

यह मालिका के लेखन में भी सिद्ध हुआ है कि हमारी शास्त्रीय परंपरा के अनुसार यदि किसी घर पर गिद्ध पक्षी बैठ जाए तो वह उस घर में रहने वाले लोगों पर आगामी संकट का संकेत होता है। उसी प्रकार श्रीजगन्नाथ मंदिर के अरुण स्तंभ पर बैठे गिद्ध पक्षी का दिखना सम्पूर्ण विश्व के मनुष्यों के लिए बड़े संकट के लक्षण हैं। अर्थात यह कलियुग के अंत और धर्म की स्थापना का पहला संकेत माना जाता है। फिर महापुरूष अच्युतानंद ने भक्त शिरोमणि गरुड़जी को बताया:-

"एही  संकेत कु जानिथा हेतु मति की नेई,

तोर  मोर भेट होइब मध्य स्थल रे जाई।"

उपरोक्त श्लोक का अर्थ है :-

गरुड़ पूछते हैं  "भगवान, जब आप कल्कि रूप में धरावतरण करेंगे, तो मैं आपसे कहाँ मिल सकता हूँ"? और कैसे मैं आपकी दर्शन प्राप्त करूंगा और स्वयं को आपकी सेवा में समर्पित करूंगा"?

महाप्रभु ने उत्तर देते हुए कहा:- "हे गरुड़, मैं आपको वहाँ मिलूँगा जहां ब्रह्मा जी का शुभ स्तंभ है, जिसे पृथ्वी का सूर्य स्तंभ माना जाता है और जिसे बिरजा क्षेत्र या गुप्त सम्भल कहा जाता है।" वही केंद्र कहलाता है। महापुरूष अच्युतानंद जी ने “हरिअर्जुन चौतिसा” में कलियुग के समाप्त होने और भगवान कल्कि के जन्म के विषय में और श्रीमंदिर में मिले अन्य संकेतों के विषय  में उल्लेख किया है।

"नीलाचल छाड़ि आम्भे जिबु जेतेबेले  लागिब रत्न चांदुआ अग्नि सेते बेले

निशा काले  मन्दिररु चोरी हेब हेले, बड़ देऊलुमोहर ख़सिब पत्थर,

बसिब जे गृध्र पक्षी अरुण स्तम्भर।बतास रे बकर हेब नीलचक्र मोर.

वरील ओळींचा अर्थ:-

वरील ओळींचा अर्थ असा आहे की महापुरुष अच्युतानंद जी यांनी स्पष्ट केले आहे - भगवंत म्हणतात की  “जेव्हा मी नीलाचल सोडेन, तेव्हा माझ्या रत्नजडित सिंहासनावरील रत्नजडित शामियाना प्रथम आग लागेल आणि माझ्या श्रीमंदिराच्या आवारात मध्यरात्री चोरी होईल, राक्षसांवरून दगड पडतील. बाटस (वादळ) मुळे नीलचक्र वळेल आणि वाकडी होईल. माझ्या अरुणस्तंभावर गिधाड पक्षी बसेल. या सर्व गोष्टी श्रीमंदिरातील श्री जगन्नाथ परिसरात घडल्या असून मलिका यांचे म्हणणे पूर्णपणे खरे ठरले आहे. यातून कलियुगाच्या पतनाचे संकेत मिळाले आहेत. त्यानंतर “कलियुग गीता” च्या दुसऱ्या अध्यायात महापुरुष अच्युतानंद जी श्री जगन्नाथ क्षेत्राच्या एका विशेष चिन्हाबद्दल सांगतात.

"मुंही नीलाचल छडी जीबी हो अर्जुन,  मोहर भंडार घरे थीब जीते धन.

डाग कलंकित झाल्यावर,  मोहर सेवक माने बटारे ना थाई”.  

वरील ओळीचा अर्थ:-  

अर्जुनने भगवान श्रीकृष्णाला विचारले, "तुम्ही नीलांचल सोडले तर श्रीक्षेत्रातून कोणती चिन्हे दिसतील, कृपया मला त्याबद्दल सांगा". भगवान श्रीकृष्ण उत्तर देतात, "अर्जुना, मी जेव्हा निलांचल सोडेन तेव्हा माझ्या मंदिराच्या आवारात असलेल्या भांडाराची प्रतिष्ठा राहणार नाही, याचा अर्थ खजिना म्हणजेच भांडाराची संपत्ती नष्ट होईल आणि तिजोरीचे सेवक धर्माचरण करणार नाहीत. भांडार पुन्हा संपत्तीने रिकामे होईल." अच्युतानंदजींनी “कलियुग गीता”च्या दुसऱ्या अध्यायात वर्णन केल्याप्रमाणे:-

"अर्जिबी धन खूप अन्याय करतो,  तनहिरे तहंक दु:ख नोहिब  विमोचन.

खाईबाकु नमिलिब,मोहर बडपंडंकू अण्णा ना मिलिब.

मोहर खराब देउलू खासीब दगड,  श्रीक्षेत्र राजन मोर नसीबी पायर

राज्य जिब नाना साध पैबा ती सेई,  तंकू मन्या ना करिब अन्य राजा केही.

या ओळीचा अर्थ असा आहे:-

"मी नीलाचल सोडल्यावर कलियुग संपेल. मी श्रीक्षेत्र सोडताच माझ्या क्षेत्रात खूप अन्याय होईल. आणि माझ्या हाताखालील नगरसेवक विविध अन्याय करून पैसे कमावतील, आणि भविष्यात माझे प्रमुख सेवक स्वतःची देखभाल देखील करू शकणार नाहीत." असे अनेक बदल श्री मंदिरात होणार आहेत. महापुरुष अच्युतानंदांनी मलिका येथील जगन्नाथ क्षेत्राचे आणखी एक चिन्ह सांगितले आहे:-

"पेजनला फुटी तोर पडिब बिजुली,

जिब जिगचे भगवान नीलाचल छडी."

या ओळींचा अर्थ आहे:-

जेव्हा श्री जगन्नाथ मंदिराच्या स्वयंपाकघरावर वीज पडेल, तेव्हा कलियुग संपेल आणि श्री जगन्नाथ निलांचल सोडून मानवी रूप धारण करतील. नुकतेच श्री जगन्नाथ मंदिराच्या स्वयंपाकघरावर वीज कोसळली असून याचा पुरावा यापूर्वीच देण्यात आला आहे. यावरून असे गृहीत धरता येईल की श्री जगन्नाथजींनी नीलांचल सोडले आणि मानवी शरीर धारण केले.

पुन्हा महापुरुष अच्युतानंद त्यांच्या “चौषथी पाताळ” या पुस्तकात श्री कल्पवताचा महिमा आणि श्री कल्पवताचा क्षय, कलियुगाचा अंत आणि भगवान श्री जगन्नाथ जी निळे आकाश सोडून मानवी देह धारण केल्याचा पुरावा देत जगन्नाथ क्षेत्रातील आणखी एका चिन्हाचे वर्णन करतात.

"से बात मुलारे अर्जुन जेहू बसिब दंडे,    मृत्यूच्या वेळी, यम राजार दंडे.

से पण मोहर बिगर झुनू हेल धक्का,  मोटे खराब भड लागाय सन माघबसूत.

से बात रु खंडे बकाल जेहू देब छडाई,  हे सील त्याच्या कातडीतून फाटल्याचे आढळून आले."

या ओळींचा अर्थ:-

मंदिरात असलेले कल्पवत हे देवाच्या मूर्तीसारखे आहे. कल्पवताची तुलना देवाच्या शरीराशी केली आहे. कल्पवतातून थोडासा तुकडाही तुटला तर परमेश्वराच्या शरीराला खूप त्रास होतो. त्यामुळे आज विचार करण्यासारखी बाब म्हणजे कल्पवताची फांदी वारंवार तुटत आहे, याचा अर्थ महापुरुषाच्या सृष्टीनुसार कल्पवताची फांदी तुटली तर भगवंतांनी नीलाचल सोडून मानवाचे शरीर घेतले आहे आणि महापुरुष अच्युतानंदांनी या विषयात वर्णन केले आहे की:-

"कल्बत घाट हेब जेतेबेले  नीलाचल छडी जीबे मदन गोपाळे.

कलबुतची फांदी पडीब ते काळेपर्यंत उगवली,  नाना अक्रम मान हेब क्षेत्रभरे.

रूद्र ठारु उनविंश पर्यन्त सेठारे,  स्थापना होइबे मोर सेवादी भाबरे।

बड़ देउलरे मुंही नरहिबी बीर,  बाहार होइबि देखि नर अत्याचार।"

अर्थ :-

महापुरूष अच्युतानंद जी ने उपरोक्त पंक्तियों में उल्लेख किया है कि जब कल्पवट की शाखा टूटेगी तो मेरे क्षेत्र में बहुत अन्याय, अनीति, अनुशासनहीनता और अराजकता फैल जाएगी । भगवान कल्कि की आयु जब 11 से 19 वर्ष  के बीच होगी तब सरकार द्वारा श्रीमंदिर का दायित्व  संभालने के लिए नये सेवक रखे जाएंगे। इस समय भगवान श्रीजगन्नाथ मनुष्यों के अत्याचार को देखकर मंदिर त्यागकर मानव शरीर ग्रहण कर चुके होंगे। मालिका की बात आज सच हो गई है। पुनः महात्मा अच्युतानंदजी ने इस स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा है कि:-

"बड़ देऊलु  मोहर पत्थर ख़सिब,  गृध्र पक्षी नील चक्र उपरे बसिब।

दिने दिने चलुरे  मु न होइबि दृश्य,  भोग सबु पोता हेब जान पाण्डु शिष्य।

समुद्र जुआर माड़ि आसीब निकटे,  रक्ष्या नकरिबे केहि प्राणींकु संकटे।"

महापुरुष ने फिर वर्णन किया कि जब गिद्ध पक्षी नीलचक्र पर बैठते हैं तब श्री जगन्नाथ के श्री मंदिर से  बारम्बार पत्थर गिरता हैं। उस समय महाप्रसाद के अर्पण  में महाप्रभु जगन्नाथ दर्शन नहीं देंगे। ऐसा बार- बार होने पर महाप्रसाद को कई बार मिट्टी के नीचे दबा  दिया जाएगा। इससे ये प्रमाण मिलता  है कि श्रीजगन्नाथ जी की मंदिर की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ को जब  महाप्रसाद अर्पित किया जाता है, तब महाप्रभु जगन्नाथजी, महाप्रसाद अर्पण करने वाले मुख्य पुजारी को दर्शन देते हैं। किन्तु  महापुरूष अच्युतानंदजी की वाणी  के अनुसार, जब गिद्ध पक्षी या बाज पक्षी नीलचक्र पर बैठता है, उस समय भगवान के श्रीमंदिर से पत्थर गिरेगा और श्रीजगन्नाथ महाप्रभु के महाप्रसाद अर्पण विधि के समय मुख्य पुजारी को दर्शन नही देंगे। और इस समय महाप्रभु का महाप्रसाद मिट्टी में दबा दिया जाएगा। महापुरुष अच्युतानंदजी ने इसका उल्लेख एक चेतावनी के रूप में किया कि इस समय, समुद्र में बार-बार तूफान आएगा और समुद्र का जलस्तर बहुत ऊपर उठेगा और पृथ्वी पर बाढ़ आएगी। जो आज धरती पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है।  यह संकेत जगन्नाथ क्षेत्र में बार–बार मिला है, और उसके बाद बड़े बड़े संकट आने वाले हैं। इसलिए उन्होंने एक सहृदय संत होने के नाते लोगों में मानसिक परिवर्तन हो और वे वैष्णव धर्म एवं ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित हों और अभक्ष्य भक्षण समेत अन्य दुर्गुणों का भी त्याग करें। इसके लिए महापुरुष ने कलियुग के मनुष्यों को सचेष्ट किया है। महापुरुष ने इस सन्दर्भ में फिर से वर्णन किया है:-

"श्री धामरु एक बड़ पाषाण ख़सिब,  दिबसरे उल्लूक तार उपरे बसिब।

मो भुबने उल्कापात हेब घन घन,  जेउ साबूने बाबूला अशुभ चिन्ह खाल्ले.”

श्री जगन्नाथजींच्या मुख्य मंदिरातून एक मोठा दगड पडेल आणि दिवसा त्या दगडावर घुबड बसेल असे महापुरुषाने सांगितले आणि या दोन्ही चिन्हे मंदिरात घडल्या आहेत आणि श्री जगन्नाथ परिसरात नजीकच्या काळात पुन्हा पुन्हा उल्का पडतील, याचा पुरावा आपल्याला महापुरुषांनी लिहिलेल्या अनेक ग्रंथांतून मिळतो.  

"जय जगन्नाथ"